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लोकसभा चुनाव में बहुमत आंकड़ों  से पीछे क्यों रह गई बीजेपी??

साल 2021 में अमेरिका स्थित एक गैर सरकारी संस्थान फ्रीडम हॉउस में भारत के लोकतंत्र को पार्शियली फ्री डेमोक्रेसी कहा था। यानी कि भारत में लोकतंत्र पूरी तरह काम नहीं कर रहा है। स्वीडन के एक संस्थान वि डेम इन्स्टिट्यूट ने तो अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भारत इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी हो गया है। मतलब दुनिया में ये एक चिंता जताई जा रही थी कि भारत का लोकतंत्र खतरे में है। भारत सरकार है तो इनका खंडन किया ही था, लेकिन लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों से भी एक बात साफ हुई कि भारत में सिर्फ एक विचार या वजह से लोगों ने वोट नहीं किया।

तभी नतीजों में किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया, जैसा कि पिछली दो बार से हो रहा था। इस बार सरकार जिसकी भी बने लेकिन संसद में विपक्ष भी मजबूत रहेगा। उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बेंजामिन इजरायल ने भी कहा था कि मजबूत विपक्ष के बिना कोई सरकार लंबे समय तक सुरक्षित नहीं हो सकती। इस चुनाव में ज्यादातर एग्ज़िट पोल अनुमान गलत साबित हुए, क्योंकि ना तो बी जे पी और ना ही एन डी ए गठबंधन वैसा प्रदर्शन दिखा सका जैसा बताया जा रहा था।

हाँ, ये जरूर कहा जा सकता है की चुनाव के केंद्र में मोदी ही थे। यानी चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा वोट फॉर मोदी या वोट अगेंस्ट मोदी बन गया था। यहाँ तक पार्टी ने अपना मैनिफेस्टो ही उनके नाम से बनाया था। मोदी की गैरॅन्टी ये भी इतिहास है। पहली बारी था की सत्ताधारी राजनीतिक दल ने अपने पी एम के नाम पर ही इलेक्शन मैनिफेस्टो जारी कर दिया। साफ था पार्टी अपने सबसे बड़े नेता को चुनावी चेहरा बनाकर प्रोजेक्ट कर रही थी। पार्टी का इतिहास देखे तो किसी भी चुनाव में सिर्फ एक व्यक्ति के इतना व्यापक चुनावी कैंपेन नहीं हुआ था।

गरीब, युवा, किसान और महिलाएं।

कहा था की भारत में यही चार जातियां हैं। बी जे पी ने फ्री भी पॉलिटिक्स यानी मुफ्त में दी जाने वाली चीजों से जुड़ी योजनाओं पर भरपूर फोकस किया। जैसे पी एम गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत अगले पांच सालों तक 80,00,00,000 भारतीयों को मुफ्त राशन देने का दावा हो, आयुष्मान भारत हो, पी एम, उज्ज्वला योजना हो या फिर पी एम आवास योजना। मोदी सरकार ने पिछले 10 सालों में करीब 22,00,00,000 परिवारों को ऐसी कई योजनाओं के दायरे में लाने का दावा किया था, जिसकी वजह से उन्हें कई चुनावी जीत भी मिली। लेकिन इस बार इस प्रचार की काट बना रोजगार का मुद्दा जो

2019 तक आपको सुनाई नहीं देता था, लेकिन इस बार इलेक्शन में ये एक मुद्दा काफी ज़ोर शोर से उठा। विपक्ष ने भी उठाया जैसे भर्तियां नहीं निकल रही, परीक्षाओं का पेपर लीक हो रहा है, परीक्षा ले ली जाती है, लेकिन नतीजे नहीं आते। वगैरह।

साथ ही 4 साल की सेना की नौकरी यानी अग्निविर योजना पर भी काफी विरोध सुनने को मिला। लोग कह रहे थे कि फ्री राशन तो ठीक है लेकिन कमाएंगे कैसे और रोजगार कहाँ है? दूसरा भाजपा अनुमान लगा रही थी कि राम मंदिर जैसा मुद्दा उन्हें मदद करेगा। इसलिए इस साल 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम भी धूमधाम से मनाया गया। खुद नरेंद्र मोदी उस कार्यक्रम के केंद्र में रहे।

इसके अलावा भाजपा के दूसरे नेताओं ने भी इसे लेकर बयानबाजी की। जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि ये चुनाव रामभक्त और रामद्रोहियों के बीच है। लेकिन अयोध्या के आसपास की सभी पाँचों सीटों पर फैज़ाबाद बाराबंकी, अमेठी, अम्बेडकर नगर और सुल्तानपुर पर भाजपा हार गई। वहीं मुसलमानों को लेकर बयानबाजी भी पी एम मोदी के काम नहीं आई। प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा में एक भाषण के दौरान कहा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो लोगों की संपत्ति को ज्यादा बच्चे वालों में बाँट देगी।

उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस हिन्दू महिलाओं के गले से मंगलसूत्र छीन कर मुसलमानों को दे देगी।

इस बयान पर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से शिकायत भी की। इतना सीधे तौर पर उन्होंने शायद ही पहले कभी बयानबाजी की थी, लेकिन उसी बांसवाड़ा सीट पर भी भाजपा को जीत नहीं मिली। इस बार कई पत्रकार और अनुमान लगा रहे थे कि भाजपा का प्रभाव बंगाल में बढ़ गया है। हिंदुत्व का मुद्दा वहाँ बढ़ रहा है, लेकिन नतीजों से तो पता चला कि बी जे पी का प्रभाव वहाँ कम हुआ है। 2019 में भाजपा ने वहाँ 18 सीटें जीती थी।

और इस बार 12 ही जीत पायी है। तीसरा नरेंद्र मोदी की छवि इन नतीजों से ऐसा लग सकता है की नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कम हुई है, लेकिन ग्राउंड पर उनकी छवि को नुकसान देखने को नहीं मिला। लोग कह रहे थे कि नरेंद्र मोदी ने भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फायदा पहुंचाया है। वहीं नरेंद्र मोदी सरकार ने हमेशा आक्रामक विदेश नीती अपनाई, जिसके तहत नए भारत के दुश्मनों को घर में घुस कर मारने तक की बात कही गई है।

लेकिन इस नीती पर विश्लेषकों का मत है कि ये नीती दक्षिण एशिया या चीन तक के खिलाफ़ बयानबाजी में तो काम आ सकती है, लेकिन ग्लोबल स्तर पर उसे संशय से देखा जाता है। पिछले दिनों कनाडा ने अपने नागरिक की हत्या की कोशिश करवाने जैसे गंभीर आरोप भारत पर लगाए। अमेरिका ने भी कहा कि उनके यहाँ भी ऐसी कोशिश हुई है। भारत ने इन आरोपों का खंडन किया था पर अमेरिका के हावार्ड विश्वविद्यालय में विज़िटिंग पेलो रहे प्रोफेसर एम के झा के मुताबिक

गवाह है कि किसी भी देश के राजनीतिक बदलाव में स्थानीय के अलावा ग्लोबल फॅक्टर्स की भी बड़ी भूमिका रहती है।

अगर जियो पॉलिटिकल स्तर पर थोड़ी भी अनिश्चितता और संचय रहता है तो लोकतांत्रिक देशों में भी उसका कुछ ना कुछ असर दिख ही जाता है। तो ऐसा हो सकता है कि नरेंद्र मोदी की छवि और उनकी विदेश नीती ने उनके पक्ष में काम किया। लेकिन यह भी हो सकता है कि ग्लोबल फॅक्टर्स की वजह?

विदेश नीती ने उनके पक्ष में काम किया, लेकिन ये भी हो सकता है कि ग्लोबल फॅक्टर्स की वजह से उन्हें नुकसान भी हुआ हो। ये भी देखना होगा कि उड़ीसा में बी जे पी ने स्वीप कर लिया है। 21 में से 20 लोकसभा सीटें भाजपा को मिली है। इसी चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव भी हुए थे, जिसमें अब बी जे पी उड़ीसा में सरकार बनाने जा रही है। और बात अगर दक्षिण भारत की करें तो बी जे पी ने तेलंगाना में आठ सीटें जीती हैं। आंध्र प्रदेश में तीन और केरल में भी एक सीट जीत ली है। दक्षिण भारत की ये तीनों सीटें ही भाजपा के लिए बढ़त है। तेलंगाना जब बना था तो बी जे पी को एक सीट मिली थी।

10 फीसद था लेकिन आज ये वोट परसेंटेज 35 फीसद हो चुका है। वहाँ पिछड़ी जातियों के वोट और नरेंद्र मोदी की अपनी लोकप्रियता ने भाजपा को यहाँ तक पहुंचने में मदद की। कर्नाटक में पिछली बार 25 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार 17 ही जीत पाई। वहाँ वोट प्रतिशत भी 5% कम हुआ है। तमिलनाडु को लेकर भी एग्ज़िट पोल में कहा जा रहा था कि बी जे पी दो तीन सीटें जीत सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पर बी जे पी का वोट शेयर काफी बड़ा है। 3.6 फीसद से बढ़कर 10.7 फीसद हो गया है। केरल में जो एक सीट तिसुर बी जे पी ने जीती है, वहाँ बी जे पी ने बहुत फोकस भी किया था। नरेंद्र मोदी खुद इस सीट पर कई बार आए थे।

तो कुल मिलाकर पिछली बार दक्षिण भारत में बी जे पी की 29 सीटें थी वो इस बार भी 29 ही है। लेकिन वही कांग्रेस ने भी 40 सीटें जीती है जो पिछली बार से बेहतर है। दरअसल, ये सब बातें एक तरफ इशारा कर रही है कि इस चुनाव से पहले जो अवधारणाएं बन गई थी, जो परसेप्शन बन गए थे वो सटीक नहीं थे।जिन मुद्दों पर चुनाव तैह होता लग रहा था वो भी अपना असर नहीं दिखा पाए
राज्यों के अपने अलग-अलग  फिलहाल ये तो कहा ही जा सकता है कि भारती मेडिया और एकजिट पोल में जो अवधाना बन गई थी वे सब लोकतंत्रिकी इस चुनावी प्रक्रिया ने क  गलत सावित की|

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